बिहार चुनाव 2025 लोकतंत्र की नब्ज़ में धड़कता जनादेश
बिहार भारतीय राजनीति का वह राज्य है जिसने देश के लोकतंत्र को दिशा देने में कई बार महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है 2025 का बिहार विधानसभा चुनाव एक बार फिर से पूरे देश के ध्यान का केंद्र बन गया है यह चुनाव सिर्फ़ सत्ता परिवर्तन या सरकार गठन का मुद्दा नहीं है बल्कि यह राज्य की सामाजिक आर्थिक और वैचारिक दिशा को तय करने वाला चुनाव बन गया है जनता के मन में रोजगार शिक्षा विकास और जातीय समीकरणों की जटिलता के बीच यह चुनाव लोकतांत्रिक भावनाओं का असली परीक्षण है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और बिहार की राजनीतिक पहचान
बिहार की राजनीति सदियों से वैचारिक आंदोलनों और जनसंघर्षों से जुड़ी रही है आज़ादी से पहले यहाँ गांधीजी के चंपारण आंदोलन ने राजनीतिक चेतना को जन्म दिया था बाद में जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन ने बिहार को लोकतंत्र के संघर्ष की भूमि बना दिया स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस ने लंबे समय तक सत्ता संभाली पर 1990 के दशक में सामाजिक न्याय के नए नारों के साथ लालू प्रसाद यादव का दौर शुरू हुआ
लालू यादव की राजनीति ने पिछड़े वर्गों को सशक्तिकरण का अहसास दिलाया वहीं विकास की दिशा में कई सवाल भी खड़े किए 2005 के बाद नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में सुशासन और विकास की राजनीति का दौर आया तब से अब तक राज्य में सत्ता का समीकरण बार बार बदलता रहा कभी भाजपा और जदयू साथ आए कभी अलग हुए तो कभी महागठबंधन ने नई शक्ल ली यही उतार चढ़ाव बिहार की राजनीति को अनोखा बनाते हैं।
2025 का राजनीतिक परिदृश्य
2025 में जब बिहार चुनाव की तैयारी शुरू हुई तब राज्य की राजनीति कई विरोधाभासों से घिरी थी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक दिशा एक बार फिर चर्चा में थी पिछले वर्षों में उन्होंने भाजपा, राजद और कांग्रेस तीनों के साथ अलग-अलग समय पर गठबंधन किया जनता के बीच यह सवाल लगातार उठता रहा कि नीतीश किसके साथ हैं लेकिन नीतीश कुमार अब भी विकास पुरुष और अनुभवी नेता की छवि को बनाए रखने की कोशिश में हैं दूसरी ओर तेजस्वी यादव की अगुवाई में राष्ट्रीय जनता दल ने युवाओं और बेरोजगारों को केंद्र में रखकर चुनावी रणनीति तैयार की तेजस्वी ने शिक्षा स्वास्थ्य और रोजगार पर जोर देते हुए नीतीश मॉडल को चुनौती दी भाजपा भी इस बार नए सिरे से संगठन को मजबूत कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर मतदाताओं तक पहुँचने में जुट गई।
जनता के मुद्दे बेरोजगारी पलायन और विकास
बिहार के मतदाता लंबे समय से विकास और रोजगार को लेकर चिंतित हैं राज्य की बड़ी आबादी आज भी पलायन को मजबूर है हर चुनाव में राजनीतिक दल यह वादा करते हैं कि बिहार को आत्मनिर्भर बनाया जाएगा लेकिन वास्तविक स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण है 2025 के चुनाव में युवा वर्ग सबसे बड़ा निर्णायक समूह बन गया है लगभग 60% से अधिक मतदाता 40 वर्ष से कम उम्र के हैं यह वर्ग न तो सिर्फ जातीय समीकरण देखता है न ही पुराने नारे वह चाहता है नौकरी बेहतर शिक्षा और आधुनिक जीवनशैली इसी वजह से इस बार सभी दलों ने रोजगार सृजन को केंद्र में रखा है।
जातीय समीकरण और सामाजिक ढांचा
बिहार की राजनीति में जाति का महत्व कभी कम नहीं हुआ यादव कुर्मी भूमिहार ब्राह्मण दलित मुसलमान हर समूह की अपनी राजनीतिक पहचान है 2025 के चुनाव में भी यह समीकरण निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं राजद को यादव मुस्लिम वोट बैंक से ताकत मिलती रही है जबकि जदयू को कुर्मी और अति पिछड़ों का समर्थन रहा है भाजपा ऊँचे वर्गों के साथ साथ गैर यादव पिछड़ों को साधने की रणनीति में है लेकिन इस बार सामाजिक समीकरणों के साथ एक नया विकास समीकरण भी उभरा है यानी जाति से ऊपर उठकर रोजगार और शिक्षा की चाहत गाँव गाँव में अब यह चर्चा है कि किसने कितना काम किया यह बदलाव बिहार की राजनीति में धीरे धीरे नयी चेतना का संकेत देता है।
चुनावी अभियान की रणनीति और प्रचार का अंदाज़
2025 का चुनाव अब सोशल मीडिया का चुनाव बन चुका है फेसबुक एक्स ट्विटर इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर हर दल ने अपने डिजिटल प्रचार तंत्र को मजबूत किया है युवा नेता रील और वीडियो के ज़रिए जनता से सीधे संवाद कर रहे हैं तेजस्वी यादव ने युवा बिहार नयी सोच का नारा दिया वहीं भाजपा ने मोदी के साथ विकास के हाथ पर ज़ोर दिया नीतीश कुमार ने फिर से काम बोलता है और विश्वास का पुल जैसी मुहिम चलाई ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक जनसभाओं के साथ साथ जनसंवाद रथ और डिजिटल मंच दोनों ने माहौल बनाया।
प्रशासनिक प्रदर्शन और विपक्ष की आलोचना
पिछले कार्यकाल में नीतीश सरकार ने सड़क बिजली और शिक्षा के क्षेत्र में सुधार किए परंतु स्वास्थ्य और बेरोजगारी के मोर्चे पर आलोचनाएँ झेलनी पड़ीं तेजस्वी यादव ने नीतीश पर यह आरोप लगाया कि सरकार ने वादे तो बहुत किए पर अमल कम हुआ भाजपा ने भी जदयू पर अनिर्णय और अस्थिरता का ठप्पा लगाया विपक्ष ने शराबबंदी नीति की असफलता कानून व्यवस्था की स्थिति और भ्रष्टाचार के मामलों को बड़ा मुद्दा बनाया।
महिला मतदाताओं की भूमिका
बिहार की राजनीति में महिला मतदाताओं की भूमिका अब निर्णायक बन गई है 2025 के चुनाव में महिला वोटिंग प्रतिशत पहले से अधिक रहने की उम्मीद है नीतीश कुमार ने हमेशा आरक्षण और महिला सशक्तिकरण को अपनी राजनीति का केंद्र रखा है दूसरी ओर राजद और भाजपा दोनों ने महिला सुरक्षा और स्वावलंबन पर अलग अलग योजनाएँ घोषित की हैं महिला वर्ग अब सिर्फ़ घरेलू मुद्दों पर नहीं बल्कि शिक्षा और आर्थिक अवसरों पर भी वोट दे रहा है।
चुनावी नतीजों की संभावनाएँ
2025 के बिहार चुनाव का नतीजा इस बार बेहद रोचक होने वाला है कोई भी पार्टी एकतरफा बढ़त में नहीं दिख रही ग्रामीण इलाकों में जातीय निष्ठा अभी भी मजबूत है पर शहरी इलाकों में युवा वर्ग और नई सोच हावी है नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक विरासत बचाने में लगे हैं जबकि तेजस्वी यादव अपने पिता के जनाधार को “नयी ऊर्जा” में बदलना चाहते हैं भाजपा संगठनात्मक ताकत के बल पर सत्ता में वापसी का सपना देख रही है ऐसे में यह चुनाव न तो सिर्फ़ किसी व्यक्ति का है न ही किसी पार्टी का बल्कि यह बिहार की दिशा और दशा तय करने वाला चुनाव है।
मीडिया और जनभावना की भूमिका
मीडिया ने इस बार बिहार चुनाव को राष्ट्रीय मुद्दों से जोड़कर पेश किया है बेरोजगारी कानून व्यवस्था और केंद्र राज्य संबंधों पर लगातार बहसें हुईं टीवी चैनलों पर बड़े बड़े सर्वे और डिबेट चले पर जनता की आवाज़ गाँव की गलियों और चौपालों में ही सबसे प्रामाणिक रूप में सुनाई दी सोशल मीडिया ने युवा मतदाताओं को जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई लेकिन फेक न्यूज़ और अफवाहें भी उतनी ही तेज़ी से फैलीं।
भविष्य की दिशा
बिहार चुनाव 2025 सिर्फ़ सरकार बनाने की प्रक्रिया नहीं बल्कि यह बिहार की आत्मा का पुनर्निर्माण है राज्य आज भी देश के बौद्धिक केंद्रों में गिना जाता है यहाँ की धरती ने बुद्ध आर्यभट्ट चाणक्य जैसे महापुरुष दिए अब बिहार को राजनीतिक स्थिरता और दीर्घकालिक विकास की जरूरत है। युवा पीढ़ी अब जातीय दीवारों को तोड़कर काम और ईमान की राजनीति की ओर बढ़ रही है।
निष्कर्ष लोकतंत्र का नया अध्याय
2025 का बिहार चुनाव लोकतंत्र का वह दर्पण है जिसमें जनता अपने सपनों और संघर्षों को देख रही है यह चुनाव साबित करेगा कि क्या बिहार एक बार फिर देश को नई राजनीतिक दिशा देगा या पुराने समीकरण ही दोहराए जाएँगे जिस भी दल को जनता जनादेश देगी उससे उम्मीद यही रहेगी कि वह बिहार को पलायन बेरोजगारी और असमानता से मुक्त कराकर समृद्धि की राह पर ले जाए बिहार की जनता अब परिपक्व हो चुकी है वह जानती है कि असली बदलाव न नारों से आता है न चेहरों से बल्कि नीयत और नीतियों से आता है।


