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आदि शंकराचार्य भारतीय दर्शन के महान पुनरुत्थानकर्ता

भारत की संस्कृति और दर्शन का इतिहास जब भी लिखा जाएगा वहाँ आदि शंकराचार्य का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा उन्होंने न केवल वैदिक परंपरा को पुनर्जीवित किया बल्कि अद्वैत वेदांत के माध्यम से भारतीय अध्यात्म को नया आयाम प्रदान किया शंकराचार्य का जीवन अत्यंत अल्पकालिक था लेकिन उनके कार्यों का प्रभाव सहस्राब्दियों तक व्याप्त है वे एक ऐसे मनीषी थे जिन्होंने यह बताया कि मनुष्य और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है सब एक ही हैं केवल अज्ञान के कारण अलगbअलग प्रतीत होते हैं।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

आदि शंकराचार्य का जन्म केरल राज्य के कालड़ी ग्राम में हुआ था उनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम आर्यांबा था कहा जाता है कि शंकर का जन्म ईसा के 788 वर्ष के आसपास हुआ था यह वह समय था जब भारत विभिन्न धार्मिक मतों और पंथों के संघर्ष से जूझ रहा था बौद्ध जैन और लोकायत जैसे विचारधाराओं के प्रभाव में वेदांत का स्वर क्षीण हो चला था ऐसे युग में शंकर का जन्म भारत की चेतना को फिर से एक करने के लिए हुआ बालक शंकर अत्यंत प्रतिभाशाली थे कहते हैं कि तीन वर्ष की आयु में ही उन्होंने संस्कृत बोलना प्रारंभ कर दिया था और पाँच वर्ष की आयु तक वे वेदों के मंत्रों का उच्चारण करने लगे थे उनकी स्मरणशक्ति और बुद्धि विलक्षण थी अल्पायु में ही उन्होंने वेद उपनिषद ब्राह्मण ग्रंथ और स्मृतियों का गहन अध्ययन कर लिया था।

संन्यास ग्रहण

शंकर का जीवन अद्भुत घटनाओं से भरा हुआ था जब वे आठ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया बालक शंकर अपनी माता के साथ रहते थे किंतु उनमें बाल्यावस्था से ही वैराग्य का भाव था वे संसार को माया मानते थे और ब्रह्म की खोज में लगना चाहते थे कहा जाता है कि एक बार वे नदी में स्नान कर रहे थे तभी एक मगरमच्छ ने उन्हें पकड़ लिया उस समय शंकर ने अपनी माता से संन्यास लेने की अनुमति माँगी आर्यांबा ने विवश होकर अनुमति दी और उसी क्षण मगरमच्छ ने उन्हें छोड़ दिया इस घटना को उन्होंने संन्यास ग्रहण का संकेत माना
इसके बाद उन्होंने अपने गुरु की खोज आरंभ की वे उत्तर भारत की ओर चले और गोविंद भगवत्पाद नामक महान संत से मिले ये संत गौड़पादाचार्य के शिष्य थे जिन्होंने अद्वैत वेदांत की आधारशिला रखी थी गोविंद भगवत्पाद ने शंकर को दीक्षा दी और वे उनके प्रमुख शिष्य बन गए।

ज्ञान का विस्तार और ग्रंथ रचना

संन्यास के पश्चात् शंकराचार्य ने पूरे भारत का भ्रमण किया उनका उद्देश्य था वेदांत के अद्वैत सिद्धांत को पुनर्जीवित करना और विभाजित भारत को दार्शनिक एकता में बाँधना उन्होंने अपने ज्ञान के बल पर अनेक ग्रंथों की रचना की उनके प्रमुख ग्रंथों में शामिल हैं ब्रह्मसूत्र भाष् भगवद्गीता भाष्य उपनिषद भाष्य और अनेक प्रकरण ग्रंथ जैसे विवेकचूडामणि उपदेशसाहस्री आत्मबोध तत्वबोध वाक्यवृत्ति आदि इन ग्रंथों में उन्होंने यह बताया कि ब्रह्म सत्य है जगत् मिथ्या है जीव ब्रह्मैव नापर अर्थात् ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है यह संसार अस्थायी है और जीव उसी ब्रह्म का अंश नहीं बल्कि वही ब्रह्म है केवल अज्ञान के कारण वह अपने स्वरूप को भूल गया है।

अद्वैत वेदांत का सार

शंकराचार्य का प्रमुख दार्शनिक योगदान अद्वैतवाद था अद्वैत का अर्थ है द्वैत का अभाव यानी केवल एक ही सत्ता है ब्रह्म उनके अनुसार यह ब्रह्म सत्चि त्आ नंद स्वरूप है शुद्ध अस्तित्व शुद्ध चेतना और शुद्ध आनंद संसार में जो भी विविधता दिखती है वह केवल माया की लीला है माया वह शक्ति है जो ब्रह्म के एकत्व को ढँक देती है और अनेकता का भ्रम उत्पन्न करती है उन्होंने यह भी बताया कि जब मनुष्य ज्ञान के माध्यम से इस माया के आवरण को भेद देता है तब वह जान जाता है कि वह स्वयं वही ब्रह्म है यही मोक्ष है आत्मा और परमात्मा की एकता का अनुभव।

दार्शनिक प्रतिपादन

शंकराचार्य के दर्शन में तीन मुख्य तत्व हैं ब्रह्म माया और जीव उनका मत है कि ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है माया वह शक्ति है जो ब्रह्म को सीमित रूप में प्रकट करती है और जीव वही ब्रह्म है जो माया से आच्छादित होकर सीमित अनुभव करता है उन्होंने कहा कि ज्ञान ही मुक्ति का मार्ग है कर्म और भक्ति भी आवश्यक हैं लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य ज्ञान की प्राप्ति है उन्होंने श्रवण मनन और निदिध्यासन इन तीनों को आत्म-साक्षात्कार के प्रमुख साधन बताया।

समाज सुधार और सांस्कृतिक एकता

शंकराचार्य ने केवल दर्शन का ही प्रचार नहीं किया बल्कि उन्होंने सांस्कृतिक पुनरुत्थान भी किया उन्होंने देखा कि भारत विभिन्न पंथों में बँट गया है कहीं शैव कहीं वैष्णव कहीं शाक्त कहीं गणपत उपासक उन्होंने सभी मतों में सामंजस्य स्थापित किया और कहा कि ये सब एक ही सत्य की विभिन्न रूपों में उपासना हैं।

उन्होंने चार प्रमुख मठों की स्थापना की

शृंगेरी दक्षिण भारत
द्वारका पश्चिम भारत
पुरी पूर्व भारत
ज्योतिर्मठ या बदरीनाथ उत्तर भारत

इन मठों के माध्यम से उन्होंने भारत के चारों दिशाओं को आध्यात्मिक एकता में बाँधा प्रत्येक मठ को उन्होंने एक प्रमुख शिष्य को सौंपा शृंगेरी में सुरेश्वराचार्य द्वारका में हस्तामलकाचार्य पुरी में पद्मपादाचार्य और बदरीनाथ में तोतकाश्र्य।

विवाद और शास्त्रार्थ

शंकराचार्य का जीवन केवल साधना और लेखन तक सीमित नहीं था उन्होंने देशभर में भ्रमण करते हुए शास्त्रार्थों में भाग लिया उनके समय में अनेक दार्शनिक मत प्रचलित थे सांख्य योग न्याय वैशेषिक मीमांसा बौद्ध और जैन शंकराचार्य ने इन सब मतों के साथ तर्कपूर्ण संवाद किया और अद्वैत वेदांत की श्रेष्ठता सिद्ध की
सबसे प्रसिद्ध शास्त्रार्थ मंडन मिश्र के साथ हुआ मंडन मिश्र एक विद्वान मीमांसक थे और कर्मकांड के समर्थक थे शंकराचार्य ने उनसे ज्ञान की श्रेष्ठता पर वाद विवाद किया यह शास्त्रार्थ कई दिनों तक चला और अंत में मंडन मिश्र ने शंकराचार्य की बात स्वीकार की तथा उनके शिष्य बन गए बाद में वे सुरेश्वराचार्य कहलाए।

भक्ति और उपासना का समन्वय

यद्यपि शंकराचार्य का दर्शन अद्वैत है जिसमें किसी भेद की स्वीकृति नहीं है फिर भी उन्होंने भक्ति को अस्वीकार नहीं किया उन्होंने यह कहा कि जब तक व्यक्ति द्वैत के क्षेत्र में है तब तक भक्ति आवश्यक है इसलिए उन्होंने स्तोत्रों की भी रचना की जैसे शिवानंद लहरी सौंदर्य लहरी भज गोविंदम ललिता त्रिशती भाष्य गंगा स्तोत्र आदि
इन रचनाओं में शंकराचार्य की गहरी भावनात्मकता झलकती है उन्होंने यह दिखाया कि भक्ति और ज्ञान विरोधी नहीं हैं बल्कि भक्ति ज्ञान की ओर ले जाने वाली सीढ़ी है।

शंकराचार्य का भारत भ्रमण

शंकराचार्य ने संपूर्ण भारत की यात्रा की वे कश्मीर से कन्याकुमारी तक गए उन्होंने बदरीनाथ द्वारका जगन्नाथ पुरी कांचीपुरम उज्जैन नासिक प्रयाग काशी और अनेक तीर्थस्थलों का दर्शन किया प्रत्येक स्थान पर उन्होंने लोगों को अद्वैत वेदांत का संदेश दिया उनकी यात्राओं के दौरान उन्होंने अनेक मतभेदों को मिटाया और लोगों को यह समझाया कि सभी धर्म देवता और पूजा पद्धतियाँ एक ही परम सत्य की खोज के अलग अलग मार्ग हैं उनकी यात्राओं ने भारत को एक दार्शनिक अखंडता प्रदान की।

साहित्यिक योगदान

शंकराचार्य के ग्रंथों का विस्तार अत्यंत विशाल है उनके भाष्यों ने उपनिषद भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र को नया अर्थ दिया उनके प्रकरण ग्रंथों ने सामान्य जन के लिए वेदांत के गूढ़ सिद्धांतों को सरल बनाया उनके स्तोत्र आज भी भारत के मंदिरों और घरों में गाए जाते हैं भज गोविंदम जैसे गीतों में उन्होंने जीवन की अस्थिरता और ईश्वर स्मरण की आवश्यकता का मार्मिक चित्रण किया है
उनकी काव्यशैली में गहराई तर्क और भावना तीनों का अद्भुत संतुलन है।

शंकराचार्य और धर्म की एकता

शंकराचार्य ने यह स्थापित किया कि सभी देवता एक ही सत्य के प्रतीक हैं उन्होंने पंचायतन पूजा की परंपरा आरंभ की जिसमें शिव विष्णु देवी सूर्य और गणेश इन पाँच देवताओं की एक साथ पूजा होती है इसका उद्देश्य था भक्ति में सामंजस्य और संप्रदायिक एकता उन्होंने यह सिखाया कि चाहे आप किसी देवता की उपासना करें अंतत आप उसी परम ब्रह्म की उपासना कर रहे हैं इस दृष्टि से वे भारत में धार्मिक समरसता के सबसे बड़े प्रवर्तक माने जाते हैं।

शंकराचार्य का जीवन आदर्श

शंकराचार्य ने मात्र बत्तीस वर्ष की आयु में अपने शरीर का त्याग किया कहा जाता है कि उनका संन्यास हिमालय के केदारनाथ क्षेत्र में हुआ इतने अल्प जीवन में उन्होंने जो कार्य किया वह युगों तक असंभव प्रतीत होता है उनका जीवन त्याग ज्ञान तर्क और प्रेम का संगम था उन्होंने यह दिखाया कि सच्चा ज्ञान केवल पुस्तकों में नहीं बल्कि अनुभव में है और वह अनुभव तभी संभव है जब मनुष्य अहंकार द्वेष और आसक्ति से मुक्त हो।

शंकराचार्य के दर्शन की स्थायी प्रासंगिकता

आदि शंकराचार्य का दर्शन केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि मानव-चेतना का दार्शनिक विज्ञान है आज भी जब संसार भेद हिंसा और संघर्ष में उलझा हुआ है शंकराचार्य का अद्वैत संदेश शांति और एकता की राह दिखाता है उनका सिद्धांत यह सिखाता है कि यदि हम सब एक ही परम सत्ता के अंश हैं तो एक दूसरे से द्वेष क्यों यही विचार मानवता की नींव है विज्ञान दर्शन और आध्यात्म तीनों में आज भी शंकराचार्य का अद्वैत दृष्टिकोण जीवित है। आधुनिक मनोविज्ञान भौतिकी और क्वांटम सिद्धांतों में जो एकता का सिद्धांत दिखाई देता है वह कहीं न कहीं अद्वैत की ही गूंज है।

समापन विचार

आदि शंकराचार्य भारतीय आत्मा के दूत थे उन्होंने यह दिखाया कि सत्य की खोज बाहर नहीं अंतर में है उन्होंने आत्मा को ब्रह्म के साथ जोड़ा तर्क को श्रद्धा से मिलाया और दर्शन को जीवन से जोड़ा उनकी शिक्षा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 1200 वर्ष पहले थी जब भी कोई व्यक्ति यह पूछेगा मैं कौन हूँ तब शंकराचार्य के शब्द गूंजेंगे तत्त्वमसि तू वही है उनकी जीवनगाथा यह सिखाती है कि ज्ञान और करुणा तर्क और प्रेम भक्ति और विवेक ये सब एक दूसरे के पूरक हैं इस प्रकार आदि शंकराचार्य केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि भारत की आत्मा का स्वरूप हैं उनका संदेश युगों-युगों तक मानवता के लिए दीपक बना रहेगा जैसे उनके नाम में ही है शंकर यानी कल्याण का दाता और आचार्य यानी ज्ञान का मार्गदर्शक।

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