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बिहार चुनाव में सीटों का बँटवारा

बिहार भारत के उन राज्यों में से एक है जहाँ राजनीति केवल एक चुनावी प्रक्रिया नहीं बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक परिघटना है यहाँ की राजनीति जातीय सामाजिक धार्मिक और विकासात्मक समीकरणों के जाल में गहराई से उलझी हुई है बिहार विधान सभा की कुल 243 सीटें इस राज्य की जनसांख्यिकीय और राजनीतिक विविधता का प्रतीक हैं इन सीटों पर आधारित सत्ता की बुनियाद पूरे राज्य के शासन का निर्धारण करती है इसलिए जब हम सीटों का बँटवारा कहते हैं तो इसका अर्थ केवल गठबंधन के बीच सीटों की संख्या बाँटना नहीं होता बल्कि इसके पीछे का सामाजि भौगोलिक और राजनीतिक गणित भी होता है।

बिहार विधान सभा की संरचना और आरक्षण व्यवस्था

बिहार विधानसभा में कुल 243 सदस्य चुने जाते हैं इनमें से कुछ सीटें अनुसूचित जाति SC और अनुसूचित जनजाति ST के लिए आरक्षित हैं यह आरक्षण भारत के संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 के तहत सुनिश्चित किया गया है ताकि समाज के वंचित वर्गों को भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिले आरक्षित सीटों का यह वितरण 2008 के डिलिमिटेशन आदेश के तहत तय किया गया था इस आदेश के बाद कई पुराने निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ बदलीं कुछ का नाम बदला और कुछ नए सीटों का निर्माण हुआ।

इन परिवर्तनों का असर यह हुआ कि पहले जिन सीटों पर किसी खास समुदाय या पार्टी का दबदबा था वहाँ अब नई जनसांख्यिकीय संरचना बन गई यही वजह है कि हर चुनाव में राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति नयी सिरे से बनानी पड़ती है।

सीमांकन Delimitation और राजनीतिक भूगोल का प्रभाव

सीमांकन यानी वह प्रक्रिया है जिसमें विधानसभा या लोकसभा क्षेत्रों की सीमाएँ जनसंख्या के अनुपात में तय की जाती हैं बिहार में यह प्रक्रिया आख़िरी बार 2008 में हुई थी इस सीमांकन ने राज्य के चुनावी भूगोल को पूरी तरह से बदल दिया उदाहरण के तौर पर कुछ पुराने निर्वाचन क्षेत्र जो पहले एक ही जिले में आते थे अब दो हिस्सों में बँट गए कहीं कहीं ग्रामीण इलाकों की जनसंख्या बढ़ने से नए निर्वाचन क्षेत्र बने और शहरी इलाकों की कुछ सीटें एकीकृत कर दी गईं इस बदलाव का परिणाम यह हुआ कि पार्टियों को नई सीटों पर नया समीकरण बनाना पड़ा पुराने सुरक्षित गढ़ कई बार खत्म हो गए और कुछ नई सीटें उभरीं जो अप्रत्याशित परिणाम देने लगीं।

बिहार का सामाजिक और जनसांख्यिकीय परिदृश्य

बिहार की राजनीति में सामाजिक संरचना यानी जातीय समीकरण सबसे निर्णायक भूमिका निभाते हैं राज्य की आबादी में यादव कुर्मी राजपूत भूमिहार पासवान कोइरी मुसलमान ब्राह्मण दलित और महादलित जैसे वर्गों का महत्वपूर्ण हिस्सा है इन जातियों का अनुपात और उनका राजनीतिक झुकाव हर विधानसभा क्षेत्र में अलग अलग होता है इसलिए किसी भी दल के लिए सीटों का बँटवारा करते समय यह देखना ज़रूरी होता है कि किस क्षेत्र में कौन सा समुदाय बहुमत में है और वहाँ उनका प्रभाव कितना है।

उदाहरण के लिए

सीमांचल कटिहार अररिया किशनगंज में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।, मगध क्षेत्र गया नवादा औरंगाबाद में दलित पिछड़े वर्गों का प्रभुत्व है।, पटना भोजपुर और सारण क्षेत्र में उच्च जातियों का प्रभाव अधिक देखा जाता है।, इन्हीं कारकों के आधार पर राजनीतिक दल यह तय करते हैं कि किस क्षेत्र में किस उम्मीदवार या पार्टी को टिकट दिया जाए।, 2020 के चुनावों से मिली सीख, 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव राज्य की राजनीति में एक अहम मोड़ साबित हुआ उस समय दो प्रमुख गठबंधन आमने सामने थे।, NDA राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन जिसमें JDU BJP HAM और VIP शामिल थे।

महागठबंधन MGB जिसमें RJD कांग्रेस और वामदल शामिल थे।

इस चुनाव में RJD सबसे बड़ी पार्टी बनी 75 सीटें लेकिन NDA को बहुमत 125 सीटें मिला इस परिणाम से यह स्पष्ट हुआ कि वोट प्रतिशत और सीटों की संख्या में बड़ा अंतर आ सकता है यानी केवल वोटों की संख्या नहीं बल्कि उनका भौगोलिक वितरण यह तय करता है कि कौन सी पार्टी कितनी सीटें जीतती है यह सीख सभी दलों के लिए 2025 के चुनाव में सीटों के बँटवारे का मुख्य आधार बनी।

2025 चुनाव की तैयारी और चरणबद्ध मतदान

2025 में बिहार 122 सीटों र विधानसभा चुनाव दो चरणों में हो रहे हैं पहले चरण में 121 सीटों पर और दूसरे चरण में 122 सीटों पर मतदान होगा इस तरह का चरणबद्ध चुनाव दलों को अपनी रणनीति लचीली रखने की अनुमति देता है पहले चरण के मतदान के बाद यदि किसी क्षेत्र में कोई विशेष लहर दिखाई देती है तो दूसरे चरण में पार्टियाँ उसी के अनुसार प्रचार और गठबंधन की दिशा बदल सकती हैं लेकिन इसका एक नकारात्मक पहलू यह भी है कि पहले चरण के परिणामों का असर दूसरे चरण के मतदाताओं पर भी पड़ता है इसलिए राजनीतिक दल पहले चरण को अपनी साख की परीक्षा मानते हैं।

गठबंधन राजनीति और सीट बँटवारे की रणनीति

बिहार में गठबंधन राजनीति सबसे बड़ा चुनावी हथियार है कोई भी दल अकेले 243 में से 122 सीटें जीतना लगभग असंभव मानता है इसीलिए दलों को मिलकर सीट शेयरिंग यानी सीटों का बँटवारा करना पड़ता है
उदाहरण के तौर पर 2020 में NDA के अंतर्गत BJP ने 121 और JDU ने 115 सीटों पर चुनाव लड़ा था जबकि महागठबंधन में RJD ने 144 और कांग्रेस ने 70 सीटें ली थीं।

2025 के लिए भी इसी तरह के नए समीकरण बन रहे हैं।

NDA में BJP की भूमिका अब पहले से बड़ी है क्योंकि JDU की सीटें कुछ घटाई जा सकती हैं।

वहीं महागठबंधन में RJD प्रमुख भूमिका निभा रही है और कांग्रेस को सीमित सीटें मिल सकती हैं।

छोटे दलों की भूमिका और वोट कटवा समीकरण

बिहार की राजनीति में छोटे दलों का भी बड़ा प्रभाव होता है जैसे AIMIM RLSP HAM VIP और क्षेत्रीय स्तर के कुछ स्वतंत्र उम्मीदवार इनका वोट प्रतिशत भले ही 3% हो लेकिन यह कई सीटों के नतीजों को बदल देता है उदाहरण के लिए सीमांचल में AIMIM की उपस्थिति महागठबंधन के लिए चुनौती है क्योंकि उसका वोट बैंक मुस्लिम मतदाता वर्ग से आता है इसीलिए बड़े गठबंधन छोटे दलों को समायोजन के तहत कुछ सीटें देकर साथ रखने की कोशिश करते हैं ताकि वोटों का बिखराव न हो।

मीडिया सर्वे और चुनावी हवा का असर

हर चुनाव से पहले मीडिया हाउस और एजेंसियाँ ओपिनियन पोल और सर्वे निकालती हैं लेकिन बिहार जैसे राज्य में ये सर्वे हमेशा सटीक नहीं होते 2020 में भी ज़्यादातर सर्वे NDA की हार दिखा रहे थे जबकि परिणाम उलटे आए इसलिए 2025 में दल केवल मीडिया रिपोर्ट पर भरोसा नहीं कर रहे हैं वे अपने स्तर पर ग्राउंड सर्वे जनसंपर्क रिपोर्ट और पिछले बूथ डेटा का विश्लेषण कर रहे हैं।

सीटों का बँटवारा एक जटिल और रणनीतिक प्रक्रिया

बिहार में सीटों का बँटवारा केवल संख्या का खेल नहीं बल्कि रणनीति समाज भूगोल और इतिहास का मिश्रण है यह एक जीवंत प्रक्रिया है जहाँ हर दल को सामाजिक गणित राजनीतिक लाभ और स्थानीय असंतुलन तीनों को ध्यान में रखना होता है 243 सीटों के इस विशाल परिदृश्य में हर सीट अपनी अलग कहानी कहती है कहीं जातीय समीकरण हावी हैं कहीं विकास मुद्दा है तो कहीं भावनात्मक और धार्मिक प्रभाव निर्णायक हैं 2025 का बिहार चुनाव इसलिए सबसे अधिक रोमांचक और रणनीतिक माना जा रहा है क्योंकि सीटों का बँटवारा अब सिर्फ गठबंधन के बीच का समझौता नहीं रहा बल्कि यह बिहार के भविष्य की दिशा तय करने वाला राजनीतिक शतरंज बन चुका है।

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