Tariffs: भारतीय वस्तुओं पर निर्यात शुल्क घटा सकता है अमेरिका, व्यापार वार्ता के बीच सीईए नागेश्वरन का दावा
भारतीय निर्यात और अमेरिका की भूमिका
भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य अमेरिका है। साल 2023-24 में भारत से अमेरिका को कुल निर्यात लगभग 118 अरब डॉलर तक पहुंचा। इसमें प्रमुख योगदान फार्मा, आईटी सेवाएं, रत्न-ज्वेलरी, वस्त्र और कृषि उत्पादों का रहा। अमेरिका भारतीय आईटी उद्योग के लिए सबसे बड़ा उपभोक्ता है, वहीं भारतीय फार्मा कंपनियां अमेरिकी हेल्थ सेक्टर में जेनेरिक दवाओं की रीढ़ मानी जाती हैं।
निर्यात शुल्क कम होने का मतलब होगा कि इन वस्तुओं की लागत अमेरिका में कम हो जाएगी। इसका सीधा फायदा भारतीय कंपनियों को मिलेगा और अमेरिका में उनकी पकड़ और मजबूत होगी।
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स्टील और एल्युमिनियम सेक्टर पर असर
स्टील और एल्युमिनियम भारतीय निर्यात का अहम हिस्सा हैं। अमेरिका ने 2018 में ‘सेक्शन 232’ के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर भारत से आयातित स्टील पर 25% और एल्युमिनियम पर 10% शुल्क लगा दिया था। इस फैसले से भारतीय उद्योग को भारी नुकसान हुआ।
यदि अब अमेरिका इन टैरिफ को कम करता है तो भारतीय स्टील कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मकता फिर से बढ़ सकती है। भारत में स्टील उत्पादन लागत पहले से ही अपेक्षाकृत कम है, ऐसे में शुल्क कम होने पर भारतीय उत्पाद अमेरिका में चीनी और कोरियाई कंपनियों से बेहतर स्थिति में होंगे।
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फार्मास्यूटिकल्स उद्योग पर संभावित प्रभाव
भारत को “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” कहा जाता है। भारतीय दवा कंपनियां अमेरिका को सबसे अधिक जेनेरिक दवाइयां निर्यात करती हैं। हालांकि, अमेरिका अक्सर अपने घरेलू उद्योग को बचाने के लिए कुछ नीतिगत अवरोध खड़ा करता रहा है। यदि अमेरिका शुल्क कम करता है तो भारतीय दवाओं की लागत वहां और भी किफायती होगी।
इसका फायदा अमेरिकी मरीजों और बीमा कंपनियों को भी मिलेगा क्योंकि स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च घटेगा। भारत की सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज, सिप्ला जैसी कंपनियां इसका बड़ा लाभ उठा सकती हैं।
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आईटी और सेवा क्षेत्र का महत्व
आईटी सेक्टर भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। अमेरिका इस क्षेत्र का सबसे बड़ा ग्राहक है। यहां निर्यात शुल्क सीधे लागू नहीं होते, लेकिन अप्रत्यक्ष टैक्सेशन और वीज़ा नियम भारतीय कंपनियों पर असर डालते हैं। यदि व्यापार वार्ता में अमेरिका सेवाओं के क्षेत्र में भी कुछ रियायतें देता है तो भारतीय आईटी कंपनियों की ग्रोथ और तेज हो सकती है।
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कृषि उत्पादों में अवसर
भारत लंबे समय से चाहता है कि अमेरिका उसके कृषि उत्पादों जैसे बासमती चावल, मसाले, चाय, कॉफी और ऑर्गेनिक उत्पादों पर शुल्क कम करे। अमेरिका में भारतीय मसालों और चावल की बड़ी मांग है। टैरिफ घटने से भारत का ग्रामीण और कृषि अर्थतंत्र मजबूत होगा।
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व्यापार वार्ताओं की पेचीदगियां
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ताएं हमेशा आसान नहीं रहीं। अमेरिका चाहता है कि भारत अपने बाजार को कृषि, डेयरी और ई-कॉमर्स के लिए खोले। वहीं भारत यह आशंका जताता रहा है कि इससे उसके किसानों और छोटे व्यापारियों पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
हालांकि, हालिया दौर की वार्ताओं में दोनों पक्षों ने संतुलन बनाने की कोशिश की है। भारत ने कुछ कृषि उत्पादों पर अमेरिका को रियायत दी है और बदले में अमेरिका शुल्क घटाने पर सहमत हो रहा है।
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संभावित लाभ
भारत का निर्यात कई गुना बढ़ सकता है।
छोटे और मझोले उद्योगों को अमेरिकी बाजार में नई पहचान मिलेगी।
भारत में उत्पादन और रोज़गार में बढ़ोतरी होगी।
दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन सुधरेगा।
अमेरिका को भी सस्ते और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद मिलेंगे।
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चुनौतियां
हालांकि, टैरिफ घटाना कोई स्थायी समाधान नहीं है। अमेरिका अक्सर घरेलू उद्योगों के दबाव में नीतियां बदलता है। यदि भविष्य में राजनीतिक या आर्थिक माहौल बदलता है तो वह फिर से शुल्क बढ़ा सकता है।
दूसरी बड़ी चुनौती यह है कि अमेरिका बदले में भारत से कृषि और डेयरी उत्पादों के बाजार खोलने की मांग करेगा। भारत में किसान संगठन लंबे समय से विदेशी कृषि आयात का विरोध करते आए हैं।
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वैश्विक संदर्भ
अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध के कारण अमेरिका भारत को सप्लाई चेन का नया केंद्र बनाना चाहता है। यह भारत के लिए बड़ा अवसर है। यदि भारत अमेरिकी बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करता है तो वह एशिया और यूरोप में भी अपनी स्थिति बेहतर कर सकता है।
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निवेश और पूंजी प्रवाह
जब टैरिफ घटते हैं तो विदेशी निवेशकों का भरोसा भी बढ़ता है। अमेरिकी कंपनियां भारत में उत्पादन केंद्र स्थापित करने के लिए निवेश कर सकती हैं। इससे भारत का मेक इन इंडिया अभियान मजबूत होगा और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा।
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भारत की रणनीतिक स्थिति
भारत की अर्थव्यवस्था वर्तमान में तेजी से उभर रही है। अमेरिका के साथ व्यापारिक रियायतें मिलने पर भारत की रणनीतिक स्थिति और भी मजबूत होगी। यह न केवल आर्थिक दृष्टि से बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी भारत को मजबूती देगा। चीन और रूस के बीच बढ़ते समीकरणों के बीच अमेरिका-भारत का आर्थिक सहयोग वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
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निष्कर्ष
सीईए नागेश्वरन का यह दावा कि अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर निर्यात शुल्क घटा सकता है, भविष्य की संभावनाओं का संकेत है। यदि यह कदम उठाया जाता है तो भारतीय निर्यातकों को राहत मिलेगी, रोजगार बढ़ेगा और भारत वैश्विक व्यापार में और मजबूत होगा। हालांकि, चुनौतियां भी मौजूद हैं, लेकिन यदि दोनों देश आपसी सहयोग और संतुलन बनाए रखते हैं तो यह समझौता आने वाले समय में ऐतिहासिक साबित हो सकता है।
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